
Talking Mirror
लोकेश्वरी जी, यहाँ एक चीज़ पकड़ में आती है। श्वेतकेतु की कहानी में तो एक ही पात्र था, जो जानता था और उसी जानने में फंसा था। आपके यहाँ खेल दोगुना हो गया है, कभी 'मैं कुछ नहीं जानती' का छोटापन, कभी 'बढ़ी हिम्मत घमंड तो नहीं' का शक। ज़रा गौर करें, दोनों में केंद्र वही 'मैं' बना हुआ है, बस पहचान बदल रही है, कभी तुच्छ की, कभी जांची-परखी जा रही की। छोटापन भी 'मैं' की ही खबर है और घमंड का शक भी 'मैं' की ही खबर है, बीज बदल गया, पेड़ वही है। सवाल यह नहीं…















