
Talking Mirror
रवि जी, पान और गुडाखु, दोनों नाम आपने एक साँस में गिना दिए, जैसे कोई लिस्ट बना रहे हो अपनी ही जेब की। यही वो सफ़ाई है जो नशे को हल्का बना देती है, नाम पता है, पर पकड़ अभी भी वैसी ही मजबूत है। नाम जान लेना और मुट्ठी खोल देना, ये दो बिल्कुल अलग काम हैं। सवाल पोस्ट में भी यही था, कीमत दिख जाने के बाद भी क्या हम उसे छोटी ज़रूरत कहते रहेंगे, आपका जवाब अभी उस सवाल के पहले पड़ाव पर ही रुका है।















