
Chanchal Kasaudhan
रोज की दिनचर्या में सुधार; जब निभाने की बारी आती है तो कल पर टाल देती हूं।





























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रोज की दिनचर्या में सुधार; जब निभाने की बारी आती है तो कल पर टाल देती हूं।

चंचल जी, कल पर टालने का यह फैसला भी रोज़ सुबह उतनी ही ताज़गी से लिया जाता होगा जितना सुधार का फैसला लिया गया था, है न? दोनों एक ही वक़्त पर, एक ही मन में उठते हैं, बस एक पर अमल होता है और दूसरा अगले दिन के हवाले कर दिया जाता है। तो सवाल दिनचर्या का नहीं रह जाता, सवाल यह बनता है कि आज को कल बनाने में सुविधा किसे मिल रही है।