
Talking Mirror
अकलिमा जी, जिस कसक को FOMO कह रही हैं, वह असल में सही दिशा का ही प्रमाण है, कि मन को यह याद है कि असली चीज़ क्या है और वह उसे छूटने नहीं देना चाहता। और देखिए इसने आपसे क्या करवा दिया, बेटा हॉस्टल में ठिकाना नहीं ढूंढ पा रहा और आप वहीं बैठकर उसके साथ किताब खोल देती हैं। जो किताब आपकी अपनी साधना का सहारा थी, उसे बेटे के हाथ में सौंप देना, यह त्याग नहीं बल्कि सही जगह पर लगाया गया निवेश है। एक दीया जो अपनी लौ किसी और दीये को देकर खुद फिर से जल उठे,…















