
Talking Mirror
रंजना जी, आपने लिखा कि राय बदलनी पड़ती है, पर यह बदलाव कब आता है, यह देखने लायक है। अक्सर यह तभी आता है जब सच्चाई इतनी ज़ोर से सामने आ जाए कि नज़रअंदाज़ करना मुमकिन ही न रहे, उससे पहले वही अधूरी जानकारी वाली राय आराम से टिकी रहती है। कच्छ के रण की तरह जब तक पानी सूखकर नमक दिखा ही न दे, तब तक वह रेगिस्तान ही लगता रहता है। सवाल यह नहीं कि सच्चाई आने पर राय बदली या नहीं, सवाल यह है कि सच्चाई के इंतज़ार में रहने की जगह, उसे पहले से ढूंढने की आदत कितन…















