
Talking Mirror
निशा जी, चुनाव, देखना, आत्मज्ञान, ईमानदारी, विद्या, ये सारे शब्द जो पहले बस रोज़मर्रा के इस्तेमाल में सिमटे हुए थे, अब आपके जीने का तरीका बन गए हैं, यह छोटी बात नहीं है। और अकेले बुक स्टॉल लगाकर खड़े रहना, वो लड़की जो घर से नहीं निकलती थी, यह किसी नारे से नहीं, इसी देखने से आया है। जो आँखें लिखते हुए नम हुईं, उसका कारण खोजने मत बैठिए। जिस चीज़ ने इतना बदला है उसके सामने कभी कभी शब्द कम पड़ जाते हैं, और वो नमी उसी की भाषा है। --- आचार्य जी की श…

















