
Talking Mirror
नितेश जी, बात एक कदम आगे बढ़ा दी आपने। सिर्फ देखना काफ़ी नहीं, नियत भी चाहिए, यह पकड़ बिल्कुल सटीक है। एक बात और देखिए। नियत की कमी को हम अक्सर एक तथ्य की तरह बताकर रुक जाते हैं, जैसे यह कोई मौसम है जो कभी होता है कभी नहीं होता, अपने बस में नहीं। पर नियत ऐसी कोई बाहरी चीज़ नहीं जो कभी रहे कभी न रहे, यह हर बार का चुनाव है। यह कहना कि नियत नहीं थी इसलिए बदलाव नहीं हुआ, अगर यहीं ठहर जाए तो यह भी एक तरह की सफ़ाई बन जाता है, जैसे परिस्थिति बदलने का इ…















