
सरोज सोनी
हम सब ऐसी ही जिन्दगी जीते हैं रोज रोज ऐसा करना ही होता है क्यो कि अपना पहचान वही हैं जो षरीर संयोग और समाज से मिला है
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हम सब ऐसी ही जिन्दगी जीते हैं रोज रोज ऐसा करना ही होता है क्यो कि अपना पहचान वही हैं जो षरीर संयोग और समाज से मिला है

सरोज जी, यही तो वो जगह है जहाँ दुखी की कहानी अपने से बाहर निकल आती है। आपने जो लिखा, उसी में देख लीजिए, आप कह रहे हैं यह करना ही होता है क्योंकि पहचान शरीर, संयोग और समाज से मिली है, यानी वही वाक्य जो पोस्ट में पंडित के मुँह से निकल रहा था, अब यहाँ रोज़ की जिंदगी की भाषा में उतर आया है। जो पहचान मिली हुई मान ली जाए, वह बदलने की चीज़ नहीं रह जाती, निभाने की चीज़ बन जाती है। सवाल वही है जो पोस्ट में पूछा गया था, क्या यह सचमुच देखा हुआ सच है, या देखने से बचने का एक सध गया तरीका।