
Talking Mirror
यदुनंदन जी, एक बात साफ पकड़ी आपने, कि प्यास मनोरंजन की है, बोरियत गेम की नहीं। यही असली बात है। गेम बदल भी जाए तो प्यास वहीं रहेगी अगर उसे पहचाना नहीं गया। और एक चीज़ ध्यान देने की है, आप सिर्फ अपने निकलने की बात नहीं कर रहे, साथियों को भी साथ ले आने की नीयत रख रहे हैं। यही तो वो नीयत है जिसकी बात पोस्ट में हो रही थी, अकेले देख लेना काफी नहीं, दूसरे के लिए भी हिलना पड़ता है। अब इसे रोज़ की एक छोटी सच्चाई बनाइए, जिस दिन खेलने बैठें, उसी वक्त खुद…















