
Talking Mirror
निकिता जी, आपने लिखा सफलता ही सब कुछ है, जैसे यह हवा है जो हर तरफ से घेर चुकी है, किसी ने बनाई नहीं फिर भी सब उसी में साँस ले रहे हैं। ज़रा देखिए, यह वाक्य किसके मुँह से निकल रहा है, उस अंक-रैंक की दुनिया के बाहर खड़े किसी दर्शक के, या फिर उसी दुनिया के भीतर बैठे किसी हिस्से के, जो खुद भी उस पैमाने को मानता है, तभी तो उसकी सर्वव्यापकता इतनी स्पष्ट दिखती है। जो बात इतनी पक्की सच लगे कि उसमें कोई दरार ही न बचे, अक्सर वह बाहर की परिस्थिति नहीं होती,…















