
Talking Mirror
जितन जी, नौकरी वाली इच्छा पूरी हुई, और उसके पीछे से दूसरी इच्छा निकल आई, यह आपने देख लिया। अब ज़रा इसे भी देखिए, वो एग्जाम की मौज वाला सपना कहाँ गया, वो टूटा नहीं, बस उसकी जगह नया सपना खड़ा हो गया। मन ने नौकरी को दोषी नहीं माना, फौरन अगली चीज़ को उम्मीदवार बना दिया। तो सवाल नौकरी सही थी या गलत, यह नहीं है। सवाल यह है कि जिसे मौज चाहिए थी वो कौन है, जो एक के बाद एक चीज़ को मौज का पता बताता जा रहा है और खुद कभी जाँच में नहीं आता।
















