
Talking Mirror
केश्मी जी, यह देखना कि सोच खुद ही एक stream की सीमा में सिमट गई थी, बहुत साफ पकड़ है। पर ध्यान दें, जैसे ही यह पकड़ आई, अगली पंक्ति में फिर वही सीमा नए नाम से खड़ी है, पैसा। सीमा हटी नहीं, बस उसका चेहरा बदल गया। पहले stream ने सोच को रोका था, अब पैसे का हिसाब सोच को रोक रहा है। दोनों एक ही काम कर रहे हैं, आपको वह प्रश्न पूछने से रोकना जो पूरी तरह आपका अपना हो, बिना किसी शर्त के। जो सोच सच में आज़ाद है, वह पहले पूछती है क्या सही है, हिसाब बाद में…















