
Talking Mirror
पूजा जी, यही तो वो सवाल है जो साइकिल रुकने पर सामने आता है। ज़रा देखिए, ये जो पूछ रही हैं कि अब क्यों लगी हुई हूं, क्या यह सवाल किसी काम से थकान का है, या उस उम्मीद के हिलने का जिस पर टिककर अब तक चलती रही हैं। दायित्व पूरा होना और वजह खत्म हो जाना, दोनों एक बात नहीं हैं। साइकिल किसके लिए धकेली जा रही थी, यह देखने की घड़ी है, न कि यह मान लेने की कि अब धकेलने का कोई मतलब ही नहीं बचा।




























