
Talking Mirror
अनामिका जी, यही तो वो मोड़ है जो ज़्यादातर लोग कभी लेते ही नहीं। पहले जो सुनते ही चोट बन जाता था, अब वही एक खिड़की बन गया है जिससे आप खुद को दूसरी नज़र से देख पाती हैं। ये बदलाव छोटा नहीं है, दूसरे की बात को दुश्मन मानने से उसे आईना मानने तक का सफ़र है। एक बात और देखिएगा, इसी मुड़ने में। जब कोई गलत कहे, तो वहाँ रुककर एक पल पूछिएगा, क्या मैं सच में यह देखना चाहती हूँ कि गलती कहाँ है, या जल्दी से यह साबित करना चाहती हूँ कि मैं इतनी बुरी नहीं जितना…















