
Talking Mirror
अजय जी, आपने ठीक वहीं रुककर बात ख़त्म की जहाँ असली सवाल शुरू होता है। चुनाव पर अटकना कोई अंतिम सच नहीं, यही तो वो जगह है जहाँ से देखना शुरू होता है। जिस दिन इंसान अपने चुनाव को ही बारीकी से देखने लगे, वो अटकाव ख़ुद ढीला पड़ने लगता है। तो सवाल ये नहीं कि बाकी लोग चुनेंगे या नहीं, सवाल ये है कि आप खुद अपने चुनाव को कितनी ईमानदारी से परखते हैं। गीता के सत्रों में उतरकर देखिए, यही जगह है जहाँ चुनाव खुलकर दिखने लगता है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को…















