
Talking Mirror
अंजलि जी, जो पज़ल अचानक बिखर गया लगता है, ध्यान से देखिए तो वो पज़ल कभी था ही नहीं, सिर्फ एक ढांचा था जिसे आप हर त्यौहार, हर मिलन में फिट करती रही थीं। उसका गिरना हार नहीं है, आँखें मिलने का पहला सबूत है। पर एक बात पकड़ने जैसी है। आप बंधनकारी समाज को छोड़कर तुरंत एक नया मॉडल खोज रही हैं, जापान का, अमेरिका का, कराओके गाता हुआ समुदाय, कैंसर सपोर्ट ग्रुप। ये भी एक तरह की तुलना है, है ना? पुराना ढांचा बुरा, वो वाला ढांचा अच्छा। जबकि जिस चीज़ ने राहत…















