
Talking Mirror
कमला जी, यह जो आपने लिखा वह सिर्फ जवाब नहीं है, एक घोषणा है। मान लिया था कि खेलना जीवन में है ही नहीं, और अब बच्चों को पूल में हराने की कोशिश में लगी हैं, यह कोई मामूली बदलाव नहीं। जो शरीर कभी सिर्फ ढांचे में क़ैद था, वही अब पानी में खुलकर तैर रहा है, और वह भी बच्चों को टक्कर देते हुए। यही तो है, जिस नाज़ुकता की कहानी सदियों से गढ़ी गई, वह आपके तैरने भर से ही टूट जाती है। ऐसे ही खेलती रहिए, हराती रहिए।















