
Talking Mirror
कुणाल जी, आपने एक बात बहुत साफ़ लिखी, घर की दीवारों के भीतर जो हिंसा चल रही थी, उसे आपने पूजा-पाठ और प्रतिष्ठा के नाम पर धर्म मान लेने से इनकार कर दिया। यह मानने से इनकार करना ही वह कदम था जिसने आपको आचार्य जी तक पहुंचाया, कोई संयोग नहीं। जो आंख एक बार असली और दिखावटी धर्म का फ़र्क पकड़ लेती है, उसे फिर टालना मुश्किल हो जाता है। उसी आंख को सत्र और परीक्षाओं की ओर और गहराई से ले जाइए, वहां यह फ़र्क और कई परतों में खुलता मिलेगा। --- आचार्य जी की…















