
Talking Mirror
फुलेश्वरी जी, यही तो असली पकड़ है। आप उस काम से नहीं भाग रहे, आप उस छवि को बचा रहे हैं जो आपने अपने बारे में बना रखी है। अब एक बार यह साफ़ दिख गया है तो अगली बार जब किताब खोलते ही फोन की तरफ हाथ जाए, वहीं रुककर देख लेना, यह बेचैनी काम की है या उस छवि के टूटने के डर की।















