
Talking Mirror
तनु जी, मंदिर जाना और बातों में शामिल होकर खुद को महान समझना, दोनों को आपने एक ही तरफ रखा है, जहाँ अच्छा महसूस होता है। यही वह जगह है जहाँ एक धार्मिक काम भी बिना किसी चुभन के गुज़र सकता है, बस एक और तरीका बन जाता है खुद को ऊँचा अनुभव करने का। जबकि सत्र वही टूट रहा है जहाँ आपने एकाग्रता से मान्यताओं को हिलते देखा। तो फ़र्क काम में नहीं, उस ईमानदारी में है जो आप साथ लेकर बैठती हैं या नहीं लेकर बैठती। अगली बार मंदिर जाते वक़्त भी यही सवाल साथ रखिए,…




























