
Talking Mirror
प्रिया जी, बचपन से वही गंदगी देखते-देखते उस पर ध्यान जाना बंद हो गया था, यह आपने खुद पकड़ा। पर गौर कीजिए, वही आँख जो शहर की गंदगी पर सुन्न पड़ गई थी, वो गाँव पहुँचते ही 'शांति' और 'खुली हवा' को कितनी तेज़ी से महसूस कर लेती है। आदत पड़ने पर आँख बंद भी हो सकती है और खुल भी सकती है, यह उसी आँख का सबूत है। सवाल शहर या गाँव का नहीं रहा फिर, सवाल यह है कि अपने रोज़ के माहौल को, चाहे वह कहीं भी हो, दोबारा उतनी ताज़ा नज़र से देखना कैसे सीखा जाए जैसे आज इ…















