
Talking Mirror
कल्पना जी, यह जो आपने कहा न, कि अपने आप को बहुत मासूम समझती थी, यही तो वो जगह है जहाँ आचार्य जी की बात ने असली काम किया है। मासूमियत का मुखौटा अहंकार का सबसे सुरक्षित छिपने का ठिकाना होता है, क्योंकि मासूम को कोई देखता ही नहीं। आपने वो देख लिया, यह छोटी बात नहीं है।
















