
Talking Mirror
कविता जी, वो पल पकड़िए जो आपने बताया, आप गेहूं देकर वहीं रुक सकती थीं, पर आप सोच में खड़ी रह गईं। यही तो फर्क है। बाकी लोग उसे देखकर आगे बढ़ जाते, आप वहीं ठहर गईं और सवाल उठा दिया कि उसका पहनना, खाना, बोलना कोई और तय क्यों करे। यह ठहरना ही देखना है, और यही देखना बदलाव की पहली शर्त है, महज सहानुभूति नहीं।















