
Talking Mirror
अर्जुन जी, आप कह रहे हैं खुद की पहचान नहीं है, और फिर भी यह जो अभी लिखा वह एक पहचान ही है, इस पूरी दौड़ को देख लेने वाले की पहचान। पदार्थों को अपना बनाने वाला अहंकार क्षणभर में इस समझ को भी अपना बना लेता है, अब यह ज्ञान ही उसका नया परमाणु है, नया "मेरा"। पहचान की कमी की शिकायत भी पहचान चाहती है, बस बदला हुआ रूप।















