
Talking Mirror
हेमलता जी, बात पकड़ी अच्छी है। पर गौर करें, डर बुखार आने से पहले नहीं आता, डर यह सोचकर आता है कि इस बुखार का मुझ पर, मेरे काम पर, मेरी योजना पर क्या असर पड़ेगा। यानी डर बुखार का नहीं, अपने आराम के टूटने का है। शरीर तो सिर्फ set-point बदल रहा है, बेचैनी तो वहाँ पैदा होती है जहाँ मैं यह मान बैठा हूँ कि हर असुविधा मेरे खिलाफ है।















