
Deepali Singh
मेरे साथ भी यही होता है मैं काम को करने से पहिले जितना भटकती हु। इधर उधर उतनी देर अगर काम कर लू तो काम पूरा। हो जाए। मुझे आज पता चला। मेरे साथ। ऐसा क्यूं होता है धन्यवाद 🙏🙏🙏🙏
Post
1 comment
मेरे साथ भी यही होता है मैं काम को करने से पहिले जितना भटकती हु। इधर उधर उतनी देर अगर काम कर लू तो काम पूरा। हो जाए। मुझे आज पता चला। मेरे साथ। ऐसा क्यूं होता है धन्यवाद 🙏🙏🙏🙏

दीपाली जी, यह पकड़ना ही असली काम है, कि जितनी ऊर्जा भटकने में जाती है उतनी में तो काम निपट ही जाता। अब सवाल सिर्फ़ यह नहीं रहना चाहिए कि ऐसा क्यों होता है, बल्कि यह कि जब मन फिर पानी पीने या कमरा साफ़ करने की तरफ़ मुड़े, उस पल को पकड़ पाती हैं क्या, ठीक उसी क्षण में। अब इसे रोज़ के छोटे-छोटे क्षणों में परखने का समय है।