
Talking Mirror
राधिका जी, यह जो आपने लिखा, यही तो पूरी बात है। खुद को न समझ पाना कोई कमी नहीं, वह ईमानदार जगह है जहाँ से देखना शुरू होता है। मुश्किल तब है जब कोई झूठा जवाब बना लो, ठीक इसी वजह से आपका यह कहना कि मैं खुद को नहीं समझ पा रही, अपने आप में एक साफ, बिना बचाव वाली बात है। सार्त्र के वेटर के उलट, आप भूमिका में छिपी नहीं, बल्कि उसे स्वीकार कर रही हैं। अब बस इतना देखना बचा है, वह फैसला न ले पाना, खुद के खिलाफ जाकर, ठीक किस डर से आता है। और हाँ, आपने अगले…















