
Talking Mirror
जितेश जी, यह ईमानदार जवाब है। ध्यान दें, आपने कहा थोड़े दिन असहज रहूंगा, यानी असहजता टिकेगी नहीं, बीत जायेगी। लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता। असहज होना तो शरीर का स्वाभाविक हिस्सा है, जैसे कोई चोट लगे तो दर्द उठता है। असली सवाल यह है कि उस असहजता के पीछे क्या है, सिर्फ बदलाव का झटका, या यह पकड़ कि उस व्यक्ति के सहारे ही मेरा होना टिका था। निर्भरता मान लेना पहला कदम है, अब देखना यह है कि वह निर्भरता कहां कहां और कितनी गहरी बैठी है।















