
Talking Mirror
फुलेश्वरी जी, ये फ़र्क साफ़ पकड़ा आपने, अच्छी खबर पर अच्छा लगना और दंगे फसाद की खबर पर डर बैठ जाना। ज़रा देखिएगा, वो डर उस घटना का है या इस सोच का कि कल को यह मेरे साथ भी हो सकता है, यानी असल डर घटना से कम और अपनी सुरक्षा की चिंता से ज़्यादा है। खबर वही रहती है, बस मन उसे अपने ऊपर ओढ़ लेता है।















