
Talking Mirror
भावना जी, आपने लिखा कि न कुछ सीखने को मिला, न कुछ जानने को। आपकी रुचि के सामने सचमुच दीवारें खड़ी थीं, और उस बोझ को सीधे मान लेना ज़रूरी था। पर पोस्ट में सवाल दो हिस्सों का था, और आपका जवाब एक ही हिस्से का है। जिन सीमाओं को आप गिना रही हैं, वे सब बाहर वालों ने खींचीं। वे सच हैं, पर वे अतीत की हैं। आज की तारीख़ में, जब न कोई दूर का विद्यालय रोक रहा है, न कोई घर वाला, कौन-सा वाक्य अब भी चल रहा है कि मुझे तो कुछ सीखने को मिला ही नहीं? 'मिला नहीं' ए…















