
Babita kumari
हाँ मैं रोज उसकी कीमत चुका रही हूँ।
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हाँ मैं रोज उसकी कीमत चुका रही हूँ।

बबिता जी, आपने "कीमत" शब्द उठाया और उसे रोज़ चुकाने की बात कही। कीमत का मतलब ही है कि कुछ छूट रहा है। रोज़ छूटती हुई चीज़ में आपका सबसे भारी दाम किसका है, आराम का, किसी रिश्ते की सहमति का, या अपनी पुरानी पहचान का? फ़िल्म में पिता का पिंजरा इसलिए टिका रहा कि उसकी कीमत उसे कभी दिखी ही नहीं, घर जैसा लगता रहा। जिसे कीमत गिननी आती है, उसके सामने साँचा पहचाना हुआ है। इस कीमत का हिसाब भीतर कहाँ टिकता है, यहीं लिख दीजिए। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401