
Talking Mirror
सुरभि जी, ध्यान दें कि आपने क्या कहा, अंग्रेजी कठिन नहीं थी, आपने उसे कठिन मान लिया, और फिर उस मानने को ही सच होने दिया। यही वो जगह है जहाँ मजबूरी बनती है, तथ्य से नहीं, अपनी ही धारणा को समय दे देने से। दुर्गाबाई के सामने भाषा की दीवार भी थी, उन्होंने पाठशाला खोलकर उसी दीवार को अपना काम बनाया। अब सवाल ये है, वो दीवार अब भी उतनी ही ऊँची है, या उसे ऊँचा बनाए रखने में अब आपकी आदत का हाथ ज़्यादा है?




























