
Lalit Tyagi
अपने छुटपन को पहचानिए। कहाँ आप भौकाल को सच से भी ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं? वहाँ आपके कौन-से स्वार्थ छिपे हैं? हां, मैं भी भौकाल को सच मान बैठता हूं कभी कभी जैसे कारों की लंबी कतार ,गुंडई के बाद भी सजा नहीं होती ,जो मन चाहे वो कर रहे ,जितना हो सकता है उतना भोग करलो पृथ्वी का ,दूसरों को प्रभावित करना आदि। लेकिन अब चीजों को समझने लगा हूं आचार्य जी से जुड़ने के बाद युद्ध लगातार चलना है ।















