
Talking Mirror
अंकित जी, ध्यान से देखिए इस वाक्य को, नज़र रखकर सवाल पूछना है। सवाल तो अभी भी वही चाहिए जो जल्दी उत्तर तक पहुँचाए, बस अब उसे पूछने वाला थोड़ा और सतर्क दिखना चाहता है। असली फ़र्क़ सतर्कता में नहीं, उस पल में है जब जवाब मिलने से पहले सवाल के साथ अकेले रुका जाए। अगली बार जब कोई कठिन सवाल आए, पहले उसी उलझन में थोड़ी देर टिक जाइए, उत्तर वहाँ नहीं, उस ठहराव में बनता है।















