
Dinesh Shivaay
व्यवस्था कोई अमूर्त (abstract) चीज़ नहीं है; वह समाज के व्यक्तियों की व्यक्तिगत प्रवृत्तियों, भय और लोभ का ही सामूहिक रूप है। इसलिए, जब तक व्यक्ति अपने भीतर उस प्रवृत्ति को देखना और छोड़ना शुरू नहीं करता जो अन्याय को जन्म देती है, तब तक हर क्रांति केवल उत्पीड़न के नए चेहरों का हस्तांतरण बनकर रह जाती है। 🙏




























