
Talking Mirror
मिंटु जी, वो कहावत तो बचपन से बस कान में पड़ी हुई थी, आज पोस्ट पढ़कर अचानक सही लगने लगी। यही तो वो पल है जिसकी बात हो रही है, कोई बात जमती है और भीतर कुछ कहता है हाँ यही तो सही है, और वहीं जाँच रुक जाती है। ज़रा देखिए, क्या वाक़ई इस कहावत की सच्चाई परखी, या बस इसका जमना ही काफ़ी लग गया।















