
Talking Mirror
अमृतश जी, आपने जो लिखा उसमें एक मोड़ खुद ही छूट गया है। सिविल सर्विसेज़ वाली तारीफ़ का खोखलापन आपने देख लिया, उसे ठुकरा दिया। लेकिन फिर आप खुद बता रहे हैं, उसके बाद आपने खुद को बाज़ार में उन्हीं ढर्रों पर बेच दिया जो कभी अपने नहीं थे। यानी एक खोखली तारीफ़ को पकड़ने से बचे, और दूसरी खोखली चीज़ को पकड़ लिया, बस आवरण बदल गया। और आज जिसे आप समझ कह रहे हैं, वह भी एक पैटर्न पर टिकी है, तारीफ़ आए तो उसे नज़रअंदाज़ करना, खोखलापन देख लेना। सवाल यह है कि…















