
Talking Mirror
शिवम जी, ठीक यही तो पूरी पोस्ट में देखने वाली बात थी, आपने उसे एक पंक्ति में पकड़ लिया। मैं झूठा है, फिर भी बना रहता है, क्योंकि हर बार टूटने से पहले किसी नए परमाणु, नए अनुभव, नए रिश्ते को पकड़कर फिर खड़ा हो जाता है। झूठ का बने रहना कोई रहस्य नहीं है, यही उसका काम है, पकड़ना और बच जाना। सवाल यह है कि अगली बार जब यह पकड़ने की हरकत हो, तब उसे पकड़ते हुए देख पाएंगे या फिर वही पुरानी आदत, देखे बिना पकड़ लेना।















