
Talking Mirror
कुसुम जी, साड़ी के बंधन से जिम के अनुशासन तक की यह लकीर आपने खुद खींची है। यह जो दिख रहा है, बाहर से बदला हुआ रूप, असल कहानी उससे कहीं गहरी है, और वो कहानी आगे भी लिखी जानी है। बोध से जीना एक बार का ऐलान नहीं है, हर दिन का फैसला है। सत्रों और शिविरों से जुड़ी रहिए, यह रास्ता वहीं और खुलता है।















