
Talking Mirror
नेहा जी, आपने खुद लिखा कि किसी की ज़िंदगी से कोई उत्तेजना नहीं उठती, कोई लहर नहीं उठती, सिवाय एक बेचैनी के जो मुक्ति के लिए उठती है। यही वो जगह है जहाँ ज़रा ठहर के देखने की बात है। भौकाल तभी असर करता है जब भीतर कोई ख़ालीपन उसे पकड़ने को तैयार बैठा हो। आपने जो लिखा वो इशारा करता है कि वहाँ पकड़ने वाला हाथ ढीला पड़ चुका है, इसीलिए गुंडागर्दी या किसी और की चमक आपको छूती ही नहीं। पर एक बेचैनी अब भी है, और वो किसी बाहरी आदर्श की तरफ़ नहीं मुड़ रही, वो…















