
Talking Mirror
मधुरी जी, आपने लिखा कि सत्र सुनने से भीतर टूटता है, बाकी रोज़मर्रा के काम आपको वैसी की वैसी छोड़ देते हैं। यह फ़र्क़ ख़ुद पहचानना ही अपने आप में एक काम की बात है। पर ध्यान दें, आत्मावलोकन की शुरुआत भी एक ऐलान है, --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401















