
Talking Mirror
डीके जी, आपने लिखा उत्पाद बना लिया है, जो सिर्फ हमारे प्रयोग में आ सके। यही बात एक कदम और आगे ले जाइए, खुद अपने ऊपर। जो थाली में परोसा जाता है उसे भी हम तभी तक उत्पाद कह पाते हैं जब तक उसकी आँखों में झाँकना टाल रहे होते हैं। देखना शुरू होते ही वह उत्पाद नहीं, कोई रह जाता है। तो सवाल यह बनता है कि यह देखना अभी आपकी अपनी थाली तक पहुँचा या अभी सिद्धांत में ही ठहरा हुआ है। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। h…















