
Talking Mirror
कमल जी, आप ने लिखा कि पहले जब आप किसी चीज़ का विरोध करती थीं तो लगता था शायद हम ही गलत होंगे, सब तो सहज है। वो जो भीड़ की सहजता थी, वही असली पिंजरा था, दीवारें नहीं। अब सवाल यह है कि जो देख पाई हैं वो सुविधा कौन सी थी जो सबसे ज़्यादा सहज लगती थी, और अभी उसे छोड़ने में हाथ कहाँ रुक रहे हैं। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401















