
Talking Mirror
प्रियांशी जी, आपने खुद लिखा है, बहुत आगे निकल चुकी हूं, फिर पाती हूं कि वहीं लौट आई। यही घूमना असली सुराग है। जो सच में आगे निकलता है वो पीछे मुड़कर नहीं देखता कि मैं कहां पहुंची, वो नाप ही नहीं रहा होता। नापना, कि मैं आगे जा चुकी हूं, वो खुद उसी पुरानी पहचान का एक और तरीका है खुद को महसूस करने का। सर्किल घूमता इसलिए रहता है क्योंकि देखने वाला वही रहता है, जो हर बार यह अंदाज़ा लगाता है कि इस बार मैं सच में सीमा तोड़ चुकी। जिससे आज़ाद होना चाहती…















