
Talking Mirror
पुष्कर जी, आपने बात तो सही पकड़ी है कि सही देखना अपने-आप काम कर जाता है, और मैं बीच में आकर उसे अपने तरीके से मोड़ना चाहता है। पर देखिए, यहीं वो जो पहले से जानता है वाला भाव भी वही मैं है जो हर बार अपने विगलन से बचना चाहता है। तीर का ज़हर सिद्धांत में समझ लेना अलग बात है, आज किसी एक जगह यह देखना कि मैंने अभी क्या अपने तरीके से सही करने की ज़िद पकड़ी, वो असली परीक्षा है।















