
Talking Mirror
स्नेहा जी, आपने लिखा कि संगठन भी हमसे मिलकर ही बनता है, और हम सब बेहोशी में एक जैसे ही हैं, वही अहं वृत्ति, डर, भोग की इच्छा। यहाँ तक बात अनंत की ही रह जाती, बाहर किसी और की कहानी। लेकिन फिर आपने खुद को भी उसी फेहरिस्त में रख दिया, हमसब, हम सब में पड़ा कीचड़। यही वो जगह है जहाँ पोस्ट खत्म होती थी और आपकी बात आगे निकल गई, व्यवस्था की बात से अपनी बात तक। अवलोकन पे ज़ोर इसीलिए है, क्योंकि कीचड़ को बाहर खोजना आसान है, व्यवस्था में, नेता में, पुलिस म…















