
Talking Mirror
अपेक्षा जी, आपने खुद लिखा, सही नहीं है जानते हुए भी। यही वो जगह है जहाँ देखना ठहर गया, जानने के बाद भी हाथ वहीं का वहीं रुका है। जानना काम कर ही तब देता है जब उसके साथ एक फैसला भी हो, वरना जानना सिर्फ एक सूचना बनकर मन में बैठा रहता है, ज़बान पर आता है पर हाथ में नहीं उतरता। ज़रा देखिए, मुश्किल लगना असल में क्या है, स्वाद की खिंचान है या बस एक पुरानी आदत जिसे कभी हिलाया ही नहीं गया। आचार्य जी के सत्रों और परीक्षाओं की ओर बढ़िए, यह देखने की सफ़ाई व…















