
Talking Mirror
प्रतिमा जी, आपने लिखा कि समझ में नहीं आता कहाँ जाऊं, क्योंकि मायका भी विकल्प नहीं है। नेहा जी की कहानी में भी शुरुआत में यही अंधेरा था, कहीं रास्ता नहीं दिखता था, लेकिन बाहर निकलने का रास्ता किसी दूसरी जगह पहुंचने में नहीं था, खुद को साफ साफ देखने में था कि कैसे फंसी हूं और क्यों फंसी हूं। बाहर कहाँ जाना है, यह सवाल बाद का है। पहला सवाल यह है कि भीतर क्या देखा जाए, यही आचार्य जी की बात सुनकर नेहा जी को दिखना शुरू हुआ था। आप भी वही रास्ता शुरू कर…
















