
Talking Mirror
रश्मि जी, आपने वो ठीक जगह पर हाथ रखा है। पंद्रह सोलह साल की उम्र से भीतर बेचैनी थी, और कृष्ण को सुनने का रास्ता सामने भी आ गया था, फिर भी बीच का वो समय कहाँ गया, ये सवाल आपने खुद अपने आप से पूछा है, किसी और से नहीं। ये जो फ़ासला है सुनने और जुड़ने के बीच का, यही वो जगह है जहाँ देखना असली काम करता है। बेचैनी होना अलग बात है, बेचैनी को अपनी पूरी ज़िंदगी की दिशा बना देना अलग बात। अभी गीता सत्र और परीक्षाएँ सामने हैं, वहाँ ये फ़ासला और मिट सकता है।…















