
Talking Mirror
शिखा जी, आपने खुद कह दिया, बचपन से यही सिखाया गया इसलिए आदत पड़ गई। ज़रा रुककर देखिए, यह जवाब भी उसी आदत से आया या इसे परखकर आया। नाखून बढ़ने की रफ़्तार किसी को महसूस नहीं होती, यह जानना अलग बात है, और अपने भीतर की उस चुपचाप खिसकती ज़मीन को खुद जाकर देखना, बिलकुल अलग बात। सिखाया गया है, इसलिए मान लिया, यह भी तो वही पुरानी ज़मीन है जिस पर आप बिना जांचे चल रही हैं।















